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सकारात्मक सोच के साथ निर्मल मन से होती है सच्ची आराधना

मंदिरों में भगवान की आराधना करने वालों की संख्या प्रतिदिन बढ़ती जा रही है लेकिन हम यह भी देख रहे हैं कि प्रतिदिन दुख और उनके साधन भी बढ़ रहे हैं। हम शायद यह समझ नहीं पा रहे हैं कि आराधना के साथ दुख का क्या संबंध है और दोनों एक साथ क्यों बढ़ रहे हैं। जब तक हम इसकी गहराई में नही जाएंगे, तब तक हमें आराधना और दुख की सही जानकारी नहीं मिल सकती।

यह माना जाता है कि साधना और आराधना से सुख आता है, लेकिन यहां तो प्रति समय दुख की मात्रा बढ़ रही है। तो फिर यह समझना जरूरी है कि जब आराधना बढ़ रही है तो दुख क्यों बढ़ रहे हैं। जब हम गलत सोचते-करते हैं तो उसका परिणाम भी उलटा ही होता है। जैसे दूध से चाय बनानी है तो उसके लिए शक्कर और चाय पत्ती की आवश्यकता होगी पर उसी दूध में अगर नींबू डाल दिया जाए तो वह चाय नहीं, छैना बन जाएगा यानी दूध फट जाएगा। दूध में जो डालना था, वह नहीं डाला तो चाय की जगह छैना बन गया। अब इसमें दूध का क्या दोष है भला?
दोष दूध का नहीं, बल्कि चाय बनाने की प्रक्रिया का है। बस ऐसा ही कुछ भगवान की आराधना में होता है। आराधना के लिए सकारात्मक सोच, मन की निर्मलता, स्वार्थ रहित होना पड़ता है और इनके होने पर ही भगवान की आराधना सुख का कारण बनती है लेकिन हम देख रहे हैं कि जब एक छात्र मंदिर जाता तो आराधना के पीछे का उसका उद्देश्य परीक्षा में अच्छे नंबर लाना होता है, व्यापारी व्यापार अच्छे से चले, इस भावना से मंदिर जाता है।

व्यक्ति सुख की कामना के लिए जाता है तो नेता ज्यादा से ज्यादा वोट पाने के लिए भगवान की आराधना करता है। यानी आराधना के पीछे स्वार्थ छिपा हुआ है। और तो और भगवान से सौदेबाजी होने लग गई है। काम हो गया तो सोने का छात्र, मूर्ति आदि मंदिर में दूंगा। ऐसा लगता है जैसे एक फकीर भीख मांग रहा है। कभी मंदिर, कभी मस्जिद, कभी गिरजाघर जा रहा है। आराधना के पीछे लालच छिपा हुआ है तो तुम ही बताओ कि कैसे तुम्हें सुख मिलेगा। लालच तो दुख का कारण है।

मंदिर आदि धर्म के स्थान अब कर्म निर्जरा के उद्देश्य से नहीं, अपने अहंकार की पूर्ति के लिए या अपनी सोच दुनिया को बताने के लिए बनाए जा रहे हैं। जब उद्देश्य ही सही नहीं है तो सफलता कैसे मिल सकती है? पत्थर की मूर्ति तो मंत्र उच्चारण से नमस्कार योग्य बन जाती है तो तुम सोचो जिस मंदिर को बनाने का उद्देश्य सही न हो तो वह मंदिर कैसे हो सकता है। मंदिर में सच्ची आराधना करने वालों की नहीं, अहंकार की तुष्टि करने वालों, लालची व्यक्तियों, भिखारियों की संख्या बढ़ रही है, जो कुछ न कुछ मांगने ही आते हैं भगवान के दरबार में, जबकि मंदिर मांगने का नहीं, छोडऩे का स्थान हैं। यहां व्यक्ति को अपना अहंकार, ममकार, कषाय आदि का त्याग करना होता है तभी तो मंदिर आराधना सुख का कारण बन सकती है लेकिन हो तो कुछ और रहा है। आराधना के स्थान पर सौदेबाजी हो रही है। दूध में एक बूंद जहर की चली जाए तो वह दूध मरण का कारण बन जाता है और अमृत मिल जाए तो शक्तिवद्र्धक के साथ स्वादिष्ट हो जाता है। उसी तरह आराधना में लालच छिपा हुआ है, इसी कारण आराधना भी दुख का कारण बन गई है।

एक बार निस्वार्थ भाव से आराधना करके देखो, वह सब कुछ मिलेगा, जिसकी कल्पना तुमने नहीं की होगी। कर्म निर्जरा के उद्देश्य, लालच, कषाय को छोड़ करके सही उद्देश्य से भक्ति करो, मंदिर की स्थापना करो तो देखो तुम्हारा जीवन ही बदल जाएगा। जितने पुराने मंदिर हैं, वहां उतना मन पूजा करने में लगता है। हमने समय के साथ पूजन साम्रगी के साथ उसकी पद्धति ही बदल दी है। साम्रगी को बदलना तो विकास हुआ लेकिन पद्धति को बदलना तो विनाश का कारण हुआ। व्यक्ति समय के अनुसार अपनी भाषा, पहनावा तो बदले लेकिन अपना आचरण, विचार ही बदल दे तो कर्म निर्जरा की जगह कर्म बन्ध का कारण हो जाएगा।

बस, आज यही हो रहा है कि व्यक्ति ने अपने विचार, आचार ही बदल लिए हैं, धर्म के नाम पर तो वह दुखी हो रहा है। इसी कारण मंदिर में भीड़ तो दिखती पर सच्चा भक्त वही है, जो अपने बुरे कर्मों का प्रायश्चित करने आया हो। तुम बदलो तो फल भी मिलने लगा जाए, जो आराधना का सही फल होगा।

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