दोस्त बनकर भी नहीं…

दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला; वो ही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला; क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उससे; वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला; क्या ख़बर थी जो मेरी जाँ में घुला…

ऐ चाँद तू किस मजहब का है !! ईद भी तेरी और करवाचौथ भी तेरा!

बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर… क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है.. मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा, चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना ।। चाहता तो हु की ये दुनिया बदल दू पर दो…

आपने क्या कमाया उस पर कभी घमंड ना करना

आपने क्या कमाया उस पर कभी घमंड ना करना..!! क्योंकी शतरंज की पारी खतम होने के बाद राजा और मोहरे एक ही डिब्बे में रख दीये जाते है..!!