हम सभी आनंद लाना चाहते हैं जीवन में, लेकिन आता कहाँ है आनंद!

हम सभी आनंद लाना चाहते हैं जीवन में, लेकिन आता कहाँ है आनंद! हम सभी शांति चाहते हैं जीवन में, लेकिन मिलती कहाँ हैं शांति! हम सभी चाहते हैं सुख, महासुख ही बरसे, पर बरसता कभी नहीं।

तो इस संबंध में एक बात इस सूत्र से समझ लेनी जरूरी है कि हमारी चाह से नहीं आते फल, हम जो बोते हैं उससे आते हैं। हम चाहते कुछ हैं, बोते कुछ हैं। हम बोते जहर हैं, और चाहते अमृत हैं। इसलिये जब फल आते हैं तो जहर के ही आते हैं, दुख और पीड़ा के ही आते हैं — नरक ही फलित होता है।

हम सब अपने जीवन को देखें तो खयाल में आ सकता है।

जीवन भर चलकर हम सिवाय दुख के गड्ढों के और कहीं भी पहुँचते नहीं मालूम पड़ते हैं। रोज दुख घना होता चला जाता है। रोज रात कटती नहीं, और बड़ी होती चली जाती है। रोज मन पर संताप के काँटे फैलते चले जाते हैं, और फूल आनंद के कहीं खिलते हुए मालूम नहीं पड़ते। पैरों में पत्थर बंध जाते हैं दुख के, पैर नृत्य नहीं कर पाते हैं उस खुशी में, जिस खुशी की हम तलाश में हैं।

क्योंकि कहीं न कहीं हम, हम ही — क्योंकि और कोई नहीं है — कुछ गलत बो लेते हैं। उस गलत बोने में ही हम अपने शत्रु सिद्ध होते हैं!

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