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दर्पण

दर्पण–
दर्पण कांच की संरचना तक सीमित नहीं हैं।मन के लिए संसार की संरचना की दर्पण है।।मन का अपना प्रतिबिंब ही संसार में झलकता है।फूलों के लिए सारा जगत फूल है और कांटों के लिए काटा।मन के अनुरूप ही संसार में प्रतीतिया और अनुभूतियां होती हैं।जो स्वयं मैं नहीं है,उसे संसार में देख पाना असंभव है।दर्पण में अपना अस्तित्व ही प्रतिबिंबित होता है।जो नहीं है,उसे तर्पण में भी नहीं देखा जा सकता।

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